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शनिवार, 20 जनवरी 2024

कहाँ जाऊँगा मैं

 मरूँगा मैं भी एक दिन

नहीं जानता किस अपराधी की गोली

किस दंगाई के चाकू

किस गाड़ी के पहिए से

महामारी से, रक्तचाप से, कैंसर से

पानी में डूबकर

धरती में समाकर

दोस्तों से या दुश्मनों से

 

नहीं चुन पाऊँगा मैं अपनी मृत्यु

जैसे नहीं चुना था जीवन मैंने

अपना घर, गाँव, देश

वंश-गोत्र, बंधु-बांधव

जाति-धर्म

नहीं थी मेरी कोई साँस ऐसी

जो मेरी इच्छा से चली

 

अनायास ही सही मगर

कितना अपना जैसा था जीवन

कितनी अपनी धरती

कितना अपना आकाश

हवा, नदी, फूल, पक्षी

मानिनी स्त्रियाँ

नटखट बच्चे

कितने मोह-पाश

कितनी स्नेहिल गीली स्मृतियाँ

 

घटेगी एक दिन मृत्यु भी अनायास

लेकिन कहाँ ले जा सकेगी वह

इस मर्त्यलोक से दूर मुझे

रहेगी इसी मिट्टी में

असंख्य जीवनरूपों में घटने के लिए

मेरी काया

बहेगी किसी रक्त में

मेरे अंतर की शेष अग्नि

 

रोप जाऊँगा जाते-जाते

अपनी असंख्य अधूरी इच्छाएँ  यहीं

इसी धरती में !

 

-    ध्रुव गुप्त

शनिवार, 13 जनवरी 2024

इतिहास में प्रेमपत्र

प्रेम दुनिया की सबसे अद्भुत घटना है

और प्रेमपत्र उसके जीवंत साक्ष्य

मैं चाहता हूँ कि कभी

प्रेमपत्रों का इतिहास लिखूँ

यह जानते हुए भी कि उन्हें

सीने से लगाकर रोया

या हँसा जा सकता है

उनपर कविताएँ लिखी जा सकती हैं

महाकाव्य भी

उनके लिए लेकिन

इतिहास में कोई जगह नहीं होगी

 

इतिहास बनते हैं युद्ध से

विनाश से

हत्या से

रक्तपात से

सम्राटों से, लुटेरों से, दुराचारियों से

और कभी-कभी धर्म से भी

 

इतिहास में बस प्रेमपत्र दर्ज नहीं होते।

 

-ध्रुव गुप्त