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गुरुवार, 1 फ़रवरी 2024

ग़ज़ल

मैं  पीड़ा का, पीड़ा  मेरी,  हम   दोनों   की   जोड़ी   है!

छोड़ो!  इस  इतिहास  में  जाना  जोड़ी  किसने जोड़ी  है?

 

छूने   से   पहले,  छूने   की सदियों  की  तैयारी   थी

तब  जाकर   के   कान्हा  ने  राधा  की  बाँह  मरोड़ी  है।

 

माखन - मिश्री   जैसे   लगते   सूरज, चाँद, सितारे   सब

इस  सृष्टि  की  काली  मटकी   कान्हा  जी   ने   फोड़ी  है!

 

अपनी - अपनी   खाई   में  हम   दोनों   जाकर  दूर  गिरे

यह  तय  करना  मुश्किल  है  कि  रस्सी  किसने  छोड़ी है!

 

बाहर  के  दिखने   वाले   से   अंदर   के  उस  ग़ायब  तक

एक  अकेली साँस  बेचारी   कितनी   ज़्यादा   दौड़ी  है!

 

 

इससे  ज़्यादा  सहने  की  अब  मुझमें  ताक़त  है  ही  नहीं

ऐ सीने   के   पत्थर!   सुन  ले, सीना   पत्थर   थोड़ी   है!

- मनमीत 

गुरुवार, 18 जनवरी 2024

ग़ज़ल

सोच कोई पल रहा सघन है

आज बहुत विचलित ये मन है

 

बाहर बाहर शोर बहुत है

अन्दर अन्दर ख़ालीपन है

 

बार- बार सुधियों ने धोया

फिर भी मैला दिल दर्पण है

 

तुझसे नहीं शिकायत कोई

मेरी तो ख़ुद से अनबन है

 

सूरज सिर पर लिए खड़ा हूँ

पावों तले पर बहुत गलन है

 

शहरों में अपना अपना है

गाँव में अब भी अपनापन है

 

तेरे बन्दों के सुख दुख में

पूर्ण समर्पित ये जीवन है

-     डॉ .सुरेश अवस्थी