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रविवार, 7 अप्रैल 2024

तितली

 एक तितली फूल पर बैठी

पहने रंग बिरंगी परिधान

जकड़ के उसको कोमल हाथों से

करती जी भर भर कर रसपान

तेज़ हवाएँ चलीं,शाखाएँ उड़ी

तूफ़ान आया,जहाज़ डूबे

पेढ उखड़े,नौकाएँ डूबी

पर तितली फूल को प्रेम पाश में जकड़े

रही फूल संग झूमती झूलती

उसकी सुंदर काया कस कर पकड़े

ऐसा बंधन ऐसा साथ

तूफ़ानी हवा भी छुड़ा न पाई

उनका हाथ

-    इंदु मैत्रा

शनिवार, 18 नवंबर 2023

बिलखता हिमालय

 

मैं गिरिराज मैं पर्वत राज

भारत का सदा रहा सरताज

प्रहरी भारत का सदियों से

चौकीदार सा डटा रहा

सर्द बर्फीली हवा रोके

युगों से दीवार बन कर खड़ा रहा

मैं गढ़ रजत, मैं देव स्थल

ऋषि मुनियों का योग तप

जो शून्य में तपस्या कर कर के

रामायण महाभारत गाते रहे

मैं गढ़ सुन्दर, मैं हिम आलय

कैसे धवल आवरण का परिष्कार करूँ

नये पनपते आतंक का कैसे मैं बहिष्कार करूँ

कैसे उर की बर्फ़ पिघलाकर

नई गंगा का अवतरण करूं

मेरी शीतलता भंग हुई

अब कैसे रक्षा का कवच बनूँ

लोग भूल गए मेरा आभार

अब बर्फ़ भी तपने लगी

ऐसे उबल रहे शोले अंगार

रोके हर नस्ल के लोग

जो दिल में लाए विकार

अब किसको कैसे रोकूँ

मेरी युग की उपासना हुई बेकार

इस पार ज्ञान की गंगा थी

धोती खेत और सुंदर वन

ऋषि मुनि स्वच्छंद विचरते

बाँटते ज्ञान का अमृत जल

इस के कण कण में रमती

ज्ञान ओ’ कला की अमृत धारा

मैं ने भारत के उज्ज्वल मस्तक को

सदा दिया वरद साया

मेरे कैलाश पर्वत पर

विचरते शिव और पार्वती

मैंने ही दी उनको

निष्कलंक रमणीय धरती

रत्न जड़ित मुकुट धारे

गर्वित सर उठा खड़ा रहा

पर आज है सर मेरा

शर्म और दुख से झुका हुआ

उस पार के रोके यवन द्रविड

पर आज मेरा दिल व्यथित द्रवित

आज गोली उस पार नहीं इस पार चली

उस पार वालों को दी नहीं पनाह

पर अपनों को कैसे करूँ फ़ना

अब अपनों पर कैसे वार करूँ

घर में पले दुश्मनों को

किस ढाल से ढँकूँ रक्षा करूँ

गोली चली इधर से या उधर से

ग़द्दारी पनपी कहॉ से किधर से

यह सब तो हैं अपने

देख रहा हूँ कैसे भयानक सपने

यह दुश्मन था या दोस्त

लगता है कोई खाना बदोश

ज़िन्दगी के ऊबड़ खाबड़ सड़कों पर

ठोकर खा गया है

मेरा दिल ज़ख़्मी कर गया है

कोई राह से भटकते भटकते

बर्फ़ और सख़्त हो गई है

पिघलते पिघलते

पिघल के कहाँ जाएँ

गंगा भी अब थक गई है

मैल धोते- धोते

वह ऋषि मुनि भी नहीं रहे

वेदों का जो संदेश देते

इन केसर के पीले खेतों पर कहाँ से लाल रंग आया

अरे!यह तो मेरे ही खून का कतरा है

जो आतंक ने है बहाया

 -इंदु मैत्रा

शुक्रवार, 10 नवंबर 2023

हिंदी

 

हिंदी भाषा तू भारत का दर्पण

क्या गाये तेरी महिमा

कैसे कैसे करें तेरा वर्णन

हिंदी में निहित जीवन का दर्शन

गीता में वर्णित निरवान का मार्ग दुर्गम

जीवन न  बिताओ व्यर्थ

यह है एक कठिन संघर्ष

समझो इसका गहन अर्थ

पड़ो गीता जानो इसका मर्म

इन्द्रियों का भोग

प्रदूषित मायाजाल विकराल

दुखों रोगों का स्रोत

पतन का पतित जंजाल

 

हिंदी ने ही दिया विश्व को

 ज्ञान और विज्ञान

युगों पुराने नियम और सिद्धांत

इन्द्रियों का भोग हैं हानिकारक और वर्जित

मन को रोको इसी में है विवेक संचित

हिंदी भाषा में वेदों का ज्ञान

गूढ़ तत्व और सत्यों का विधान

 

हिंदी में वर्णित मन्दिरों का ऐश्वर्य

देनी देवताओं का भजन, आरती और सौंदर्य

हिंदी में सुने सूर के भजन

कबीरके दोहे और संस्कृत के वचन

 

हिंदी ने बखानी मीरा की भक्ति

प्रकीर्ति की रचना और माँ दुर्गा की शक्ति

हिंदी में ही निहित गंगा की सरगम

तीर में जिसके ऋषियों के निर्मल विचारों का उद्गम

हिंदी तू ही भजन, कीर्तन का सृजन

तेरे में ही सरलतम गीतों का उद्गार और श्रवण

हिंदी में चित्रित रामायण की अद्भुत गाथा

सीता की अटूट पतिव्रता और विरह की हृदय विदारक व्यथा

हिंदी ने बखाना गोपियों का रास

बँसुरी के स्वर में विलय नाचना गाना और परम उल्लास

हिंदी ने बखाना सुसज्जित नारियों का जौहर

जो था शत्रु की नीचता पर प्रहार और मोहर

 

हिंदी में ही रचित झाँसी की रानी की मरदानगी

नारियों की वीरता और बलिदान की कहानी

इसी भाषा में योग की सृष्टि

स्वास्थ्य और आरोग्य की सरलतम दृष्टि

हिंदी ने दिए सुन्दर स्वर और व्यंजन

स्वादिष्ट भोजन द्वारा हो रोगों का भंजन

हिंदी तेरी महिमा अपार

तू है ज्ञान भक्ति और मनोरंजन का अनुपम भंडार