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बुधवार, 17 अप्रैल 2024

गीत

 

पत्तों के कंधों पर बैठी

सकुचाई सी धूप.....

 

कुछ फुनगी पर हैं अधलेटी

उन्मीलित से नैन

मिली हवा की छुअन यकबयक

मुखर हो गए बैन

लगीं झूलने अलगनियों पर

शैशव लगे अनूप.....

 

बैठ मुँडेरी पर बतियातीं

करतीं मधुरिम हास

कहें नीम की छाया से तुम

अभी न आना पास

मुग्धा वय है अभी; लाज है

उसके ही अनुरूप.....

 

छुअन रेशमी; तन हरारती

मखमल सा अहसास

यौवन आया घुला श्वास में

उष्मा का परिहास

किरणों का आँचल लहराती

अल्हड़ता अभिरूप.....

 

दिखा क्षितिज में श्यामल साया

पाँव तले नम दूब

उतरी गिरि से पग पखारने

गई झील में डूब

रजनी का छौना पछताया

मिली न धूप अनूप.....

 

      - सुधा राठौर

शुक्रवार, 23 फ़रवरी 2024

गीत

 

बादल के संग आँखमिचौली

दिवस खेलता जाय

उष्मा को फुसलाकर बैरन

शीत कहर बरपाय.....

 

ओढ़े मेघ दुशाला छुपकर

दिनकर करता राज

धूसर मुख छवि धुँधली काया

अदृश्य स्वर्णिम ताज

है उदास प्राची उजास बिन

पाखी मौन धराय.....

 

दूर्वा के अधरों पर ठिठकीं

मोती जैसी ओस

सिकुड़ गए सब पेड़ द्वेष से

रहे सूर्य को कोस

बाट जोहते उष्मा लेकर

शायद दिन चढ़ आय.......

 

पुरवाई की प्रत्यंचा पर

सर्द हवा के तीर

लील गई किरणें दिनेश की

धुंध बड़ी बेपीर

भरी दुपहरी शाम घिरे तो

पहर- समय भरमाय.....

 

रात ओस से भीगी भीगी

हिम सा सर्द प्रभात

नमी हवा की हाड़ कँपाती

ठिठुरा जाए गात

बादल ने षड्यंत्र रचाया

कुहरा बना सहाय.....

 

-    सुधा राठौर