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बुधवार, 17 अप्रैल 2024

गीत

 

पत्तों के कंधों पर बैठी

सकुचाई सी धूप.....

 

कुछ फुनगी पर हैं अधलेटी

उन्मीलित से नैन

मिली हवा की छुअन यकबयक

मुखर हो गए बैन

लगीं झूलने अलगनियों पर

शैशव लगे अनूप.....

 

बैठ मुँडेरी पर बतियातीं

करतीं मधुरिम हास

कहें नीम की छाया से तुम

अभी न आना पास

मुग्धा वय है अभी; लाज है

उसके ही अनुरूप.....

 

छुअन रेशमी; तन हरारती

मखमल सा अहसास

यौवन आया घुला श्वास में

उष्मा का परिहास

किरणों का आँचल लहराती

अल्हड़ता अभिरूप.....

 

दिखा क्षितिज में श्यामल साया

पाँव तले नम दूब

उतरी गिरि से पग पखारने

गई झील में डूब

रजनी का छौना पछताया

मिली न धूप अनूप.....

 

      - सुधा राठौर

मंगलवार, 9 अप्रैल 2024

वसंत


रंग शौर्य  का  है  वसंत

        मत खो जाना मधुमास में

और न सम्मोहित होना

           पियूष पुष्प दल हास में.....

 

उठे नहीं कातर पुकार

         अंक लगाना आत्म व्यथा

पीर भी पतझर बनेंगी

      लिखना स्वयं की रितु कथा

व्योम मुट्ठी में उसी के

             है धैर्य जिसके पास में.....

 

मुश्किलें निष्ठुर भले हों,

                क्रुद्ध कंटकबद्ध राहें

पुष्प क्षण भर की दिलासा,

                   थामते हैं शूल बाँहें

नियम प्रकृति का समदर्शी,

             जीवन लक्ष्य विन्यास में.....

 

चेतना हो सजग दृग में

             कर्तव्य के स्वर मुखर हों

रोक लें यदि विषमताएँ

                साधनाएँ भी प्रखर  हों

अमिय नहीं मधुपान प्रिये

               क्यों बोझिल विलास में.....

 

राह अनचीन्ही को अडिग,

                मील का पत्थर बनाना

दान में अधिकार क्यों लें,

         मान हित क्यों सिर  झुकाना

पाश क्षमता का सुदृढ़, फिर

               प्रभहीन क्यों विश्वास में.....

 

- सुधा राठौर 

बुधवार, 27 मार्च 2024

मेरे राम लला

 


राम लला  का   रूप , मनोहर  सौम्य  सलोना।

नज़र नहीं  लग  जाय , लगाऊँ  एक  डिठौना।।


बालक छवि अभिरूप , अधर मुस्कान मनोहर।

उन्नत  संस्कृति  भाल ,   समेटे  दीप्त  धरोहर।।

 

मुख वैभव अति सौम्य , कांति ज्यों निश्छल बालक।

महिमा   अपरंपार , बने   जगतारण  पालक।।


सुगढ़  नासिका; पुष्ट , देह  नवनीत  सुचिक्कन।

लंबी  ग्रीवा; भौंह , सुदृढ़ जिसमें हित- चिंतन।।

 

कमल  नयन में  शील , भंगिमा  नम्र  विनीता।

समदर्शी  है   दृष्टि ,  समाहित  भाव   पुनीता।।

 

रत्नजड़ित है मुकुट , शीश पर चढ़ इठलाता।

दिनकर भी स्वयंमेव , भोर प्रभा  संग लाता।।

 

रेख- रेख  हर कोण , मुखर; अन्तस का दर्पण।

वह भव बन्धन मुक्त , करे जो तन- मन अर्पण।।

 

घुंघराले   से   केश, समेटें  जग   की   पीड़ा।

हैं  रेशम  की  भाँति,  मगर फिर भी लें बीड़ा।।

 

ज्यों  सरोज की पाँख, अधर- पुट लाल गुलाबी

जब  रहते   हैं  मौन, दिखें  किंचित  महराबी।।

 

चन्दन  तिलक लला, गंध केसर  की  महके।

दिव्य अलौकिक आभ, चहुँदिसि, लह-लह लहके।।

 

हस्ती  सम   हैं  कर्ण , अबोला  भी  सुन  लेते।

ब्रह्मा-ध्वनि स्वर-नाद, सकल तत्क्षण गुन लेते।।

 

कुण्डल आकृति  व्योम , परिक्रमा मानों करती।

नभ-जल-थल-पाताल, चराचर बीच  विचरती।।

 

वक्ष  सुदीर्घ  विशाल , कण्ठ  से  झूले   माला।

हीरक द्युति अनिमेष , स्वर्ण दमके झलकाला।।

 

कटि करधन बड़भाग, धन्य मोतिन की लड़ियाँ।

छूकर  गुन  लेतीं , मोक्ष  की  निश्चित  कड़ियाँ।।

 

हैं   बलिष्ठ  भुजदण्ड , मुलायम नर्म  उँगलियाँ।

सोहें  कंगन  चार ,  विहँसती   रहें   मुँदरियाँ।।

 

पग पैंजन झनकार , ध्वनित होती है जब-जब।

उर्जा  नव- चैतन्य , प्रवाहित  मनु में तब- तब।।

 

श्याम  बरन  है  गात , लुनाई मृदुतम मुखपर।

कर  दे भव से  पार , दर्श  है  ऐसा  सुखकर।।

 

किस बिध अंतस-बाह्य, रूप का होय बखाना।

वो सागर निःसीम , 'सुधा'  इक  मीन  समाना।

 

- सुधा राठौर

शुक्रवार, 22 मार्च 2024

सूरज आया

 

आभा आज गजब की लेकर,

            संक्रान्ति का सूरज आया,

गगन लोक से हर ग्रह के हित,

         शान्ति दूत बन सूरज आया।

 

पुत्र शनि तो अड़ा हुआ था,

              उसे मनाने सूरज आया,

आपस का मतभेद मिटा लो,

             यही जताने सूरज आया।

 

माथ नवाकर मकर रेख पर,

             उर्जा लेकर सूरज आया,

हुई बुआई, कोंपल फूटें,

           नवजीवन ले सूरज आया।

 

छोटी- छोटी  होंगी  रातें,

             दिन लंबे ले सूरज आया,

शीत हवाओं पर उष्मा का,

             पहरा लेकर सूरज आया।

 

बहुत सो चुके कंबल ताने,

              हमें जगाने सूरज आया,

अब है कर्मठता की बारी,

            नव चेतन ले सूरज आया।

 

- सुधा राठौर

शुक्रवार, 23 फ़रवरी 2024

गीत

 

बादल के संग आँखमिचौली

दिवस खेलता जाय

उष्मा को फुसलाकर बैरन

शीत कहर बरपाय.....

 

ओढ़े मेघ दुशाला छुपकर

दिनकर करता राज

धूसर मुख छवि धुँधली काया

अदृश्य स्वर्णिम ताज

है उदास प्राची उजास बिन

पाखी मौन धराय.....

 

दूर्वा के अधरों पर ठिठकीं

मोती जैसी ओस

सिकुड़ गए सब पेड़ द्वेष से

रहे सूर्य को कोस

बाट जोहते उष्मा लेकर

शायद दिन चढ़ आय.......

 

पुरवाई की प्रत्यंचा पर

सर्द हवा के तीर

लील गई किरणें दिनेश की

धुंध बड़ी बेपीर

भरी दुपहरी शाम घिरे तो

पहर- समय भरमाय.....

 

रात ओस से भीगी भीगी

हिम सा सर्द प्रभात

नमी हवा की हाड़ कँपाती

ठिठुरा जाए गात

बादल ने षड्यंत्र रचाया

कुहरा बना सहाय.....

 

-    सुधा राठौर


मंगलवार, 20 फ़रवरी 2024

मेरी-तेरी माँ


झुर्री वाली मुखाकृति से

ताक रहा है कौन

आकृति कुछ कहती हैं

शब्द मगर हैं मौन

 

श्वेत वर्ण में उसके सारे

रिश्ते सिमट गए हैं

एकाकी आँखों से लेकिन

बहता रहता नोन

 

दीप बुझ गए हैं आँखों के

चुका आस का तेल

शिला हो रही हृदय में साँसे

होने को है मौन

 

गठरी बन वह झूल रही है

झूले -सी खटिया में

हर आहट सुन चरमर स्वर की

पूछा करती.. कौन ?

 

-सुधा राठौर

सोमवार, 12 फ़रवरी 2024

शीत का गीत

 निकली है आखेट खेलने

लेकर हवा कटार

 

शूल चुभोए हाड़ कँपाए

धावक ऐसी तेज

स्वेटर, शॉल दुशाले बैरी

रहे न मानीखेज

कंबल और रजाई लगते

निष्ठुर पहरेदार

 

सिगड़ी चूल्हों की बन आयी

जलते कहीं अलाव

उष्म कवच पहनाने निकला

निष्क्रिय धूप प्रभाव

हीटर ए सी हुए निकम्मे

झेलें सर्द प्रहार.....

 

सड़कें सूनी सन्नाटे की

मुखरित है आवाज़

हिम के जेवर पहने निकली

सर्द हवाएँ आज

गर्म- गर्म हों चाय पकौड़े

घर-घर यही पुकार.....

 

नयी फसल का स्वाद दिलाए

अपरिमित सन्तोष

स्वास्थ्यवर्धिनी ऐसी रुत है

स्वयंमेव परितोष

सेहत का अनमोल खजाना

लायी सर्द बहार.....

 

वर्षा जब बन जाती बैरी

करती है विध्वंस

गर्मी की रितु कष्ट दायिनी

विचलित मानस-हंस

लेकिन सबसे सुखद सुहावन

ठण्डी का किरदार.....

 

-सुधा राठौर