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बुधवार, 10 अप्रैल 2024

ऋतुराज

 

बाग की सब क्यारियों के हाथ पीले हो गए हैं

फूल की हर पाँखुरी के ओंठ गीले हो गए हैं

श्वास में सरगम सजाता साज आया है

लग रहा है द्वार पर ऋतुराज आया है

 

साँस में बहकी हवाओं का नशा सा घुल रहा है

प्रीति की बारिश हुई है, ज्ञान सारा धुल रहा है

पर्वतों को खुशबुओं ने प्यार से छू भर लिया है

वज्र सा अड़ियल हिमालय भी अभी हिल-डुल रहा है

ज्ञानियों के ज्ञान से मन बाज आया है

लग रहा है द्वार पर ऋतुराज आया है

 

दल भ्रमर का बूटियों के पास मंडराने लगा है

कोयलों ने गीत गाए, आम बौराने लगा है

ठूँठ से लिपटी हुई है एक दीवानी लता तो

बाग का वीरान कोना, बाग कहलाने लगा है

दम्भ होकर प्रेम का मोहताज आया है

लग रहा है द्वार पर ऋतुराज आया है

 

गुनगुनी सी धूप के संग बेल-बूटों का प्रणय है

प्रेमियों को हर नियम के टूट जाने पर अभय है

ठंड से ठिठुरी धरा अंगड़ाइयाँ लेने लगी है

श्वेत छितरी बदलियों के बीच सूरज का उदय है

मोतियों के थाल में पुखराज आया है

लग रहा है द्वार पर ऋतुराज आया है

 

      - चिराग़ जैन

गुरुवार, 4 अप्रैल 2024

प्रतीक्षा

 

कब उगेगा दिन, तुम्हारे आगमन का

मैं बहुत दिन से प्रतीक्षा कर रहा हूँ

कब कोई आकार होगा इस सपन का

मैं बहुत दिन से प्रतीक्षा कर रहा हूँ

 

मैं युगों से रोज़ लिख-लिखकर संदेशे

बादलों के हाथ भेजे जा रहा हूँ

शुद्धतम जल से चरण धोऊँ तुम्हारे

आँसुओं को भी सहेजे जा रहा हूँ

कब मुझे अवसर मिलेगा आचमन का

मैं बहुत दिन से प्रतीक्षा कर रहा हूँ

 

'भोर की पहली किरण पर आओगे तुम'

-रात से हर रात ये ही कह रहा हूँ

सूर्य का उत्साह ठण्डा पड़ रहा है

और मैं भीतर ही भीतर दह रहा हूँ

हँस रहा मुझ पर हर इक तारा गगन का

मैं बहुत दिन से प्रतीक्षा कर रहा हूँ

 

चौखटों का नूर बुझने लग गया है

देहरी की आँख पथराने लगी है

बेर की हर डाल चुभने लग गयी है

मालती की देह कुम्हलाने लगी है

हो रहा नीरस निरंतर स्वर सृजन का

मैं बहुत दिन से प्रतीक्षा कर रहा हूँ

 

कौन जाने एक दिन मेरी कथा का

अंत, शबरी की कथा जैसा रहेगा

या निरन्तर बढ़ रही इस पीर का पथ

सिर्फ़ राधा की व्यथा जैसा रहेगा

बेर हूँ मैं या सुमन हूँ कुंजवन का

मैं बहुत दिन से प्रतीक्षा कर रहा हूँ

 

                   -चिराग़ जैन

मंगलवार, 27 फ़रवरी 2024

मैं तुझको न भूल पाऊँगा

 

ऐ गये साल

मैं तुझको न भूल पाऊँगा

 

तू मेरे कितने ही ख़्वाबों को सच बना के गया

तू मेरी ज़िन्दगी में ख़ुशनसीबी ला के गया

मैं क्या गिनाऊँ, तेरे पहले क्या न था मुझमें

मैं क्या बताऊँ, तूने क्या सुक़ूं भरा मुझमें

 

जो तुझसे पहले मिला था, वो कुछ छिना भी है

मेरे वजूद मेरे  ‘कुछ’ ख़ैर के बिना भी है

जो साँस आयी, उसका जाना तय हुआ समझूँ

जो मिल रहा है उसी को फ़क़त दुआ समझूँ

ये खेल ज़िन्दगी का अपने हाथ है ही नहीं

है कौन, जिसके मुक़द्दर में रात है ही नहीं

हरेक रात के बाद आई सुब्ह, क्या कम है

बहुत ख़ुशी है ज़िन्दगी में, ज़रा-सा ग़म है

ये ग़म भी याद की लज़्ज़त बढ़ाये जाता है

ख़ुशी की ख़ुश्कियों को नम बनाये जाता है

 

जो लम्हा बीत रहा है, उसे सलाम करूँ

बस इस तरह मैं ज़िन्दगी का एहतराम करूँ

मैं नये साल में तुझसे न मुँह चुराऊँगा

ऐ गये साल

मैं तुझको न भूल पाऊँगा

 

- चिराग़ जैन