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रविवार, 21 अप्रैल 2024

मैं आ रही हूँ तुम्हारे पास प्रियवर!

 मैं आ रही हूँ तुम्हारे पास प्रियवर!

 

कोई अंतर नहीं पड़ता-

 

पैदल आ रही हूँ

या बस में आ रही हूँ

या रेल में आ रही हूँ

या फ्लाइट में आ रही हूँ

 

कोई अंतर नहीं पड़ता-

 

मैं बर्तन उठाती हूँ

या ईंटों की परात उठाती हूँ

या बच्चों की कॉपियाँ उठाती हूँ

या कम्पनी की फ़ाइलें उठाती हूँ

 

बस मैं आ रही हूँ पिया जी!

 

मेरे दिल में घोर अँधेरा है

मेरी आँखों से बरसात हो रही है

रह-रह कर तुम्हारी याद की बिजली चमकती है

वही मुझे रास्ता दिखा रही है

 

सिर्फ़ तुलसीदास को नहीं यह हक़

कि वह साँप को रस्सी समझ ले

एक विरहन को भी यह हक़ मिलना चाहिए 

मैं पहुँचने ही वाली हूँ प्रियतम!

 

कोई अंतर नहीं पड़ता -


तुम किसी और के साथ हो

या मुझे भूल चुके हो

या तुम्हें भी मेरी याद आ रही है

या तुम हो भी या नहीं हो

 

मैं बिना आगा-पीछा सोचे आ रही हूँ सजन!

_

गुरुवार, 14 मार्च 2024

रावण को राम-राम!

 

राम-राम कहने  से  जिनको, अपने  मन  का  रावण  रोके!

उस  रावण  को  राम-राम!

 

अपने   तन-मन  की   लंका   को

अभी   समय   है  आग   दीजिये

अपने  घर  में  लौट  आइये  अब

कलुष - समंदर   पार     कीजिये

 

राम को  अल्ला  भी  कह  दो  तो

राम     हँसी    में     टाल     रहेंगे

धीरज  की    दीवार    के    आगे

तीर       सभी      बेहाल    रहेंगे

 

जो   थाली   में   थूक   रहा  है,

मेरे  घर  के  हर  भेदी  को:

हर  बैंगन   को   राम-राम!

 

जनम  राम  का   परण  राम  का

भजन  राम  का  मरण  राम  का

पानी     पावक      हवा    धरित्री

तारों  का   यह  गगन   राम   का

 

पुण्यात्मा  हो    या     हो    पापी

राम  से   कोई   बच       पाया

यह   कर्मों    की   मेंहदी    प्यारे

राम   से   बेहतर   रच     पाया

 

अपने  संशय  के  नागों  से, जो  ख़ुद  को  डसता  रहता  है

उस  जोबन  को  राम-राम!

 

ना  वेटीकन    ना     ही    काबा

ना     ही     ग़ाज़ा    पट्टी माँगी

अपनी    कायरता    धोने    को

इक     साबुन    की   बट्टी माँगी

 

इसमें   भी  हम  बरस  पाँच  सौ

चुप    बैठे    थे     हार   रहे   थे

उनसे  अनुग्रह   करते    थे   जो

तलवारों     की    धार    रहे   थे

 

कटे  शीश  की  मीनारों  से, रक्त  में  घुलकर  बह  जाता था

उस   चंदन    को  राम-राम!

 

यही     सनातन    रीत     हमारी

नास्तिक  तक  भी  ऋषि  हुए हैं

हमने     अपने    घोर     विरोधी

के   जाकर   भी   पाँव  छुए   हैं

 

हमको अब यह मत सिखलाओ

घर   में   मिल कर   कैसे   रहते

हमसे   ही   जाना    दुनिया   ने

घर   में   मिल कर    ऐसे   रहते

 

कैसे  अपना   भाग्य  बखानूँ? जो   भारत    में    पाया  मैंने:

उस  जीवन  को  राम-राम!

 

राम-राम  कहने  से  जिनको, अपने  मन  का  रावण  रोके!

उस  रावण  को  राम-राम!

 

-मन मीत

शनिवार, 9 मार्च 2024

'श्रद्धांजलि'

 अपनी ही  चमड़ी  से  अपनी

चमड़ी कब से  छील  रहा  हूँ

अब सूखा  तालाब हूँ लेकिन

पहले  बहती   झील  रहा  हूँ

 

ऐसा    बनने    से    पहले   मुझ को   जाना  था  डूब!

इधर  लिखी  'श्रद्धांजलि' और उधर  लिखा 'क्या ख़ूब'!

 

दिल में असली  हरियाली थी

नक़ली  बाग़  नहीं   होते   थे

आँसू   हीरों  से    मंहगे    थे

सस्ते  दाग़   नहीं    होते    थे

 

पहले  गीली   दूब  थे  हम  सब  अब  हैं   सूखी  दूब!

इधर लिखी  'श्रद्धांजलि' और उधर  लिखा 'क्या ख़ूब'!

 

इतना  तेल    लगाते  हैं   सब

बू   आती   है   चिकनाई   से

अब  किरदार  नहीं  मिलते हैं

लोग  हुए  हैं   सब  काई   से

 

जिससे   भी    मिलते    हैं,  कहते :  तुम  मेरे  महबूब!

इधर  लिखी  'श्रद्धांजलि' और उधर  लिखा 'क्या ख़ूब'!

 

नई  सदी  के  हाथ  में  दे कर

एक  खिलौना   मोबाइल  का

अच्छे    ख़ासे    इंसानों    को

फोल्डर कर  डाला फ़ाइल का

 

छोटे - छोटे   बच्चों   की   भी   निकल   रही   है  कूब!

इधर  लिखी  'श्रद्धांजलि' और उधर  लिखा 'क्या ख़ूब'!

 

इतनी  जल्दी  भाग  रहे  हम

जाने  क्या  कुछ  कर जाएँगे

इतनी   जल्दी     भागेंगे   तो

आधे   में   ही    मर    जाएँगे

 

फिर   अपनी   ही   लाश  का  कहना : क्या दौड़ी! तू ख़ूब!

इधर  लिखी  'श्रद्धांजलि' और उधर  लिखा 'क्या ख़ूब'!

 

-मन मीत

गुरुवार, 15 फ़रवरी 2024

घर की याद

  

घर   की    याद   सताती   है।

आँखों  तक       जाती  है।

 

देखो!   बादल   की   रूमाल

आँचल - सी    लहराती     है।

 

कभी-कभी ये दिल की आग

पानी   में    लग   जाती    है।

 

मेरी        काली        तनहाई

कुछ    रंगीन      बनाती    है।

 

समझ नहीं  आता ! यह दिल!

दूल्हा      है?    बाराती     है?

 

बिना   हवा   के    प्यार-पतंग

फूँकों   से    उड़     जाती   है।

 

गोरा   हो    या    काला    हो

हर     बादल    बरसाती    है।

 

इक  जंजीर    हवा   की   है

साँसों   को    समझाती     है।

 

अब    मेरा     पीछा    छोड़ो!

दिल  से   भूल  हो  जाती  है!

 

मैं   वो    किश्ती     हूँ   लोगों

जो     तूफ़ान     उठाती    है!

 

नाच     नाचता     रहता    है

मीरा   तो    खो    जाती    है!

 

हिंदी     वालों !     देखो    तो!

कविता   यूँ   हो     जाती   है!

 

एक    बला    चूरू   की   हूँ

जो   'मनमीत'    कहाती    है!

-    मन मीत

रविवार, 15 अक्टूबर 2023

गज़ल

 

सागर   तो   इतराते    हैं।

पोखर  प्यास  बुझाते  हैं।

 

कोई  याद  करे  तो  हम

दौड़े   -  दौड़े  आते   हैं।

 

मैं   आते   में  मिलता  हूँ

लोग  जिधर भी जाते  हैं।

 

छूने भर  से  पत्थर-लोग

फूलों-से   हो   जाते   हैं।

 

पैदा  होना  नाम  का   है

लोग  तभी  मर  जाते  हैं।

 

दुनिया से  अपने  दिल में

कितने  लोग  आ पाते हैं?

 

जिनको   आना  होता  है

अब तक तो आ जाते  हैं!

 

जो  ख़ुद  अपने  दुश्मन हैं

वो   किससे   टकराते   हैं?

 

'मीत'  तुम्हारे  जैसे  लोग

जल्दी  ही  मर   जाते  हैं।


- मन मीत