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सोमवार, 22 अप्रैल 2024

मेरा गाँव शहर के बाहर

 

मेरा गाँव शहर के बाहर,

पुल के एक किनारे पर है।

 

कूड़े के ऊँचे टीलों पर,

साफ-सफाई तड़प रही है,

नगर पालिका यहाँ नहीं है,

पंचायत धन हड़प रही है,

ढही दिवारों का मंदिर है,

खटिया बिछी, इनारे पर है।

 

शहरी वातावरणों से यह,

पहले ही से दूर रहा है,

सात्विकता का अब भी जीवन,

नहीं नशे से चूर रहा है,

मुख्य मार्ग पर हर विज्ञापन,

लटका एक इशारे पर है।

 

खेतों-खेतों हरियाली का,

एक  सुवासित दिन रहता है,

एक  वसंत रहा करता है,

फूल खिला कमसिन रहता है,

मन बहलाते और रिझाते

सुंदर एक विहारे पर है।

 

शिवानन्द सिंह 'सहयोगी'

शनिवार, 20 अप्रैल 2024

नवगीत हमारे कंधों पर है


कैसे कह दें?

कहो विधा !

नवगीत हमारे कंधों पर है।

 

नेटवर्क के कुल पन्नों पर,

फैला ऐसा जाल,

अच्छी रचनाओं का अब है,

बहुत बुरा हर हाल,

प्रकाशनों की

भीड़ बहुत जो,

प्रकाशकों के धंधों पर  है।

 

विज्ञापन से भरी पड़ी है,

हर घर की दीवार,

'सत्यमेव जयते' को गीता,

पढ़ती बारंबार,

हर आँगन बाज़ार

हुआ है,

लूटतंत्र हर बंधों पर है।

 

शब्दों में आपाधापी है,

हरा खेत का धान,

हर बनारसी के मुँह में है,

एक मगहिया पान,

क्या लिखना है?

का भी ठेका,

जन-समाज के अंधों पर है।

 

शिवानन्द सिंह 'सहयोगी'

सोमवार, 1 अप्रैल 2024

नई सुबह तुम!

नई सुबह तुम!

परिवर्तन का

‘लिटमस-पेपर’ हो।

 

तुम फसलों की कुसुमित बाली,

तुम सूरज की ललकित लाली,

तुम उपवन की नृत्य-नाटिका,

नई हवेली, पुलकित डाली,

तुम भँवरों की

गीत-कुंजिका,

तुम ‘लवलेटर’ हो।

 

तुम पूजा में थाल, परोसा,

तुम साँभर हो, इडली-दोसा,

तुम जलेबियाँ, तली कचौड़ी,

गरम-गरम हो बना समोसा,

तुम ही ढाबा, तुम ही होटल,

तुम ही ‘वेटर’ हो।

 

तुम यति-गति-लय, तुम अभिधा हो'

सुख-दुख और नई सुविधा हो,

सौम्य शांत तुम, किरण-कुमुदिनी,

तुम ऋतुओं की नय विविधा हो,

तुम शब्दों का लाड़ प्यार हो'

‘केयर टेकर’ हो।

 

--शिवानन्द सिंह 'सहयोगी'

शनिवार, 30 मार्च 2024

धाम अयोध्या

धाम अयोध्या,

पहुँचे राम।

 

रामभक्त हैं उमड़े-उमड़े,

राग राममय, बादल घुमड़े,

दीवाली-सी सकल दिशाएँ,

रावण के हैं फूले तुमड़े,

सजा सबेरा,

दुलहन शाम।  

 

आनंदित है चप्पा-चप्पा,

मार रही हैं खुशियाँ ठप्पा,

सोने के दरवाज़े चमके,

हँसता कल का एक हड़प्पा,

खुश है आस्था,

खुश है आम

 

अमृत है सरयू का पानी,

जिसका कोई आज न सानी,

रामकथा का हुआ जागरण,

अमर हो गई एक कहानी,

कुहरा हटा,

हुआ है घाम।

 

-शिवानन्द सिंह 'सहयोगी'

मंगलवार, 26 मार्च 2024

समय फाँदता ऊल्हा

सात दिनों से

जला नहीं है,

‘भागमती’ का चूल्हा |

 

दिन-दिन भर घूमी गलियों में

मिलता किन्तु न काम,

लगता है नाराज़ हो गए

श्रम-केशव अभिराम,

सिकड़ी माँगे,

रूठ गया है,

‘जुगजितनी’ का दूल्हा |

 

बाँई आँख फड़कती रह-रह,

सूख गए हैं गाल,

करतब कोने में मकड़ी का,

उलझा-उलझा जाल,

हड्डी-पसली,

एक हुए हैं,

उतरा हल का कूल्हा |

 

खूँटी पर ही टँगी हुई है,

बनिहारी की खाँच,

पेट में अफरा और नसों की 

जारी अनथक जाँच,

तड़पी बेबस रही अकेली,

समय फाँदता ऊल्हा |

 

-शिवानन्द सिंह 'सहयोगी'

शनिवार, 2 मार्च 2024

पिछले से पिछले के

 हँसता रहता है वसंत भी,

पतझड़ के केशों में प्राय:,

बन केसर का फूल |

 

फूलों को चुनती रहती है,

खेतों में नेहा,

बादल की छतरी के नीचे,

नाच रहे केहा,

झींसी झरी, लिपट बूँदों से,

हँसकर गले मिली है आकर,

घूँघट काढ़े धूल |

 

नहीं हुई अपवित्र घास के,

पाँवों की पायल,

नहीं हुआ है हरिअर-हरिअर,

गोयँड़ भी घायल,

हिंडोला सा, झूल रही है,

पुरवा की बाँहों में जकड़ी,

पुनर्नवा की झूल |

 

सूर्योदय होने की आहट,

लाई नई किरन,

लगे कुलाँचे भरने लय के,

हिरनी और हिरन,

पीड़ा के अक्षर बन हँसते,

पिछले से पिछले के जो हैं,

कूलवती के कूल |

 

छोटा शहर बसा भाषा का,

मधुरित मृदु शब्दित,

शब्दशक्ति पीड़ा की विलिखित,

एक गीत चर्चित,

आँसू के गालों की लाली,

भावों के किंजल्क कथानक,

त्रासदियों के मूल |

 

शिवानन्द सिंह 'सहयोगी'

बुधवार, 21 फ़रवरी 2024

गेंदे के फूल

 पगडंडी तोड़ रही

गेंदे के फूल।

 

कुहरे के कंबल में

सूरज छिपा है,

गइया’ के गोबर से

आँगन लिपा है,

गंगा नहान गई 

गँवई की धूल।

 

सरसों की पुलई पर

कविता लिखी है,

मँडराते भँवरों की

टोली दिखी है,

टुकुर-टुकुर ताक रहा

नदिया का कूल।

 

शिवता के मंदिर में

दीया जला है,

ऊँची दीवारों पर

अद्भुत कला है,

नक़दी के ब्याजों में

घूम रहा मूल।

 

शिवानन्द सिंह 'सहयोगी'

सोमवार, 19 फ़रवरी 2024

एक मुट्ठी भात

 खर्च लंबा है समय का

और छोटी है कमाई |

 

चल रहे हैं

पग नहीं हैं लड़खड़ाए,

रोज़ भूभल

में बहुत हैं छटपटाए,

ठंड में ठिठुरी हुई है,

कर्ज की मोटी रजाई |

 

एक मुट्ठी

भात की ख़ातिर जगे हैं,

इस अँधेरी

रात को शातिर लगे हैं,

चाटता है कपट लेकिन

शहर की मीठी मलाई |

 

आदमी हैं

आदमी-से रह रहे हैं,

सत्य है सब

इसलिए ही कह रहे हैं,

हार मानेगी नहीं यह

परिश्रमी अपनी कलाई |

 

शिवानन्द सिंह 'सहयोगी'

           वाराणसी