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बुधवार, 6 मार्च 2024

ठिठुर रहीं इच्छाएँ

 

 

ठिठुर रहीं इच्छाएँ, सहमे-सहमे जज्बात हैं,

यह एक नई सदी  और एक नया साल है।

 

धूप भी अब आँगन तक नहीं आती,

बिल्डिंगों के जाल हैं।

 

चिड़ियाएँ अब नहीं चहकती ,

शोरगुल से बेजार हैं।

 

आपाधापी भरे समाचारों से ,

बिखर रहे  नए विचार  हैं।

 

सभ्यता अब इतनी आगे बढ़ी,

कि ए आई का राज है.

 

धरती पर रहना भारी हुआ,

चाँद  पर नए संसार हैं।

 

कौन सुने, क्या बुनें,

सब रेडिमेड तैयार हैं.

 

अगली सदी की कौन कहे,

जीना अभी दुश्वार है।

 

जो भी होगा सब अदृश्य है,

इतना विचित्र संसार है।

 

 ठिठुर रहीं इच्छाएँ,

 एक  और नया साल है।

-अमिताभ शुक्ल 

सोमवार, 4 मार्च 2024

बीत गया

 दिन बीत गया गुनते, गुनते,

खोए समय और सपनों को,

कितना वक्त गया हाहाकारों में,

जिंदगी जी ही कहाँ सही अर्थों में

 

आया समय भी गुजरेगा अमर्यादित बातों में,

छल, कपट और स्वार्थ के झंझावातों में,

जिन बातों को कभी नहीं लिया शब्दकोश में,

उनमें ही गुजरा वक्त जब होश था .

 

सच है, सपनों को पाना होता है,

बिना अधिक विचारे पालना होता है।

वरना सपने खेत में खड़ी फसल के समान,

लुटेरे चट कर जाते हैं।

 

यह कहानी है न जाने कितने अपनों की,

उनके टूटे सपनों और जख्मों की,

जो मर्यादित रहे रिश्तों को पालने में,

उनके साथ होते रहे निर्लज्ज व्यवहार।

 

क्या सारे शास्त्र सिर्फ शब्दों और पाठों में है,

श्लोकों के अर्थ सिर्फ मुहावरों में हैं।

वरना  इतना विकास और सारे धर्मों के होते,

मनुष्य पर क्यों होते इतने अत्याचार?

 

    -अमिताभ शुक्ल

गुरुवार, 29 फ़रवरी 2024

मशीन चलाएगी मनुष्य

 कितना विचित्र चित्र हुआ,

मानव धरती पर और,

विकास का ढांचा चाँद और

मंगल पर तैयार हुआ।

 

धरती पर सारे संसाधन हैं,

चाँद और मंगल पर यान,

भेजने के आयोजन हैं,

पृथ्वी पर अभाव में है जीवन।

 

रोजगार, भूख,कुपोषण,

शिक्षा और स्वास्थ्य की समस्या,

गरीबी,भ्रष्टाचार और न्याय की व्यवस्था,

क्या मंगल और चाँद से हल होंगी?

 

यह विज्ञान नहीं पूँजी की माया है,

व्यापार बढ़ाना  और धन उपजाना है।

धरती पर जंगल, जमीन,खनिज नष्ट किए,

अब चाँद और मंगल पर खजाना है।

 

मनुज को मनुज की फिक्र नहीं,

कंप्यूटर, रोबोट और ऐआई का जमाना है.

इस तरह एक नया विकास आना है,

जिसमे मनुष्य को मशीन द्वारा चलाया जाना है।

 

     -अमिताभ शुक्ल 

शनिवार, 24 फ़रवरी 2024

आग ,प्यास और इंतजार

 एक आग और प्यास होती है,

जिसका इंतजार होता है,

जिसका न कोई नाम,

न जगह, न तारीख होती है।

 

बस आस और प्यास होती है,

उस लम्हे  को पाने की,

जिसके लिए जिंदगी कुर्बान होती है,

उस हसीन पल को पाने की तमन्ना होती है।

 

सोते ,जागते जिसके सपने देखे हों,

न कितना वक्त जाया किया हो,

चैन, नींद, प्यास खोई हों,

कितने रिश्ते और मंसूबे बिगाड़े हो।

 

जिसके तलबगार रहे हों बरसों, बरसों,

जिसके लिए बिगाड़े हों कई और सपने,

इस उम्मीद के सहारे कसीदे पढ़े हों कई सारे,

कि,वह वक्त एक दिन जिंदगी में आएगा जरूर।

 

उसके लिए ही आग, प्यास और इंतजार होता है.....

 

   -अमिताभ शुक्ल

शनिवार, 17 फ़रवरी 2024

उदासियों भरा रहा वर्ष 23

  

युक्रेन रूस युद्ध, आग की तरह की मंहगाई,

स्वजनों से जुदाई और कुछ  का बिछड़ना,

कोरोना फिर आने की खबरों का बार -बार आना,

राजनीति का सिर्फ आतंक मचाना।

ऐसे बीत गया बहुत भारी वर्ष 2023,

फुलझड़ियों की तरह आए बीच बीच में रेशमी पल,

पर वो बस रहे पल, न बन सके आज और कल,

उम्मीदें जितनी तेजी से आईं और जागीं,

उतनी ही तेजी से हुईं रफा-दफा।

न दर्द सिल पाए और,

न लग पाया घावों पर मरहम।

कुछ और नए जख्म उभर आए,

जिनकी टीस न मिटेगी अब उम्र भर।

फुलवारियों से रेगिस्तान और बियाबान की ओर जाती जिंदगी में,

 

सोचते ही रहे कुछ नए पुष्प आ जाएँ,

पर लगे हाथ कांटे ही कांटे,

लहूलुहान हुआ शरीर, दिल, दिमाग और आत्मा।

क्या बताएँ अब और इस गुजरते वर्ष की दास्तान ,

अब जिंदगी में और कुछ भले हो जाए,

इस मनहूस साल जैसा साल कभी न आए,

जिंदगी जीने को सुकून भरे कुछ वर्ष जरूर मिल जाएँ ।

 - अमिताभ शुक्ल

शुक्रवार, 16 फ़रवरी 2024

उपलब्धि पूर्ण रहा वर्ष

  

आदमियों आदमियों के बीच की दूरी बढ़ी,

देश, चाँद और मंगल की दूरी घटी।

समृद्ध हुए चंद लोग,

और गरीबी का प्रकोप और बढ़ा।

कई बस्तियाँ  उजड़ गईं,

कई शॉपिंग मॉल बने।

समाज में विखंडन बढ़ा,

अखंड भारत मजबूत हुआ।

रोजगार के अवसर कम हुए,

घर बैठे अनाज मिला।

तेज गति की ट्रेनें बढ़ीं,

ग्रामीण भारत जस का तस रहा।

कारों, मकानों की बिक्री बढ़ीं,

 

आम ट्रेनों और बसों में आवागमन बढ़ा।

प्रगति करता है राष्ट्र हमारा इस तरह,

यह यकीन और पक्का हुआ।

-अमिताभ शुक्ल

बुधवार, 14 फ़रवरी 2024

देश का मौसम


सूली पर टिका आम इंसान का जीवन,

तंत्र फल फूल रहा देश का है मौसम।

 

जान के लाले पड़े हों आम इंसानों को,

रोजी -रोटी के लिए जान हलाकान होती है।

 

कितने संघर्षों में जीवन करोड़ों इंसानों का,

फिर भी देश तरक्की कर रहा खबरें हैं समाचारों में।

 

अंग्रेज गए और गए कई रजवाड़े  हजारों सालों में,

नए राजाओं का देश मुकद्दर में लिखा है आम इंसानों के।

 

समृद्धि की इबारतों और इमारतों तले,

पिसती हैं जिंदगियाँ  नक्कार खानों में।

 

आएगा वक्त अच्छा यह सुनते- सुनते,

कई पीढ़ियाँ गुजरीं हजारों सालों में।

 - अमिताभ शुक्ल

मंगलवार, 13 फ़रवरी 2024

भटकना नियति है


यायावरी एक अभिशाप या वरदान है,

पूर्व जन्म का लिखा हुआ काम है।

बताइए भला कौन भटक सकता है उम्र भर ?

बिना एक छाँव के ,पड़ाव के।

खानाबदोश भी बसने लगे हों जब एक गाँव में ,

बसाने लगे हों रोजगार एक ठाँव पर

तब भी भटकते रहे कोई ,

यह कैसा भाग्य है?

कई जन्मों के नक्छत्रो का काम है।

ऋतुएँ बदलें या वर्ष ,

शीत , ग्रीष्म हो या वर्षा ।

इस तरह भटकना भी एक काम है,

जिसमें मिलता अनुभवों का खजाना है।

  - अमिताभ शुक्ल

 

गुरुवार, 8 फ़रवरी 2024

नए वर्ष के इंतजार में

                    

वर्ष तो आयेगा नया,

समय भी बदलेगा,

कैलेंडर ,तिथियाँ सब,

बदल जायेंगे।

 

दिशाएँ, भौगोलिक स्थितियाँ,

सारे नक्षत्रों की भी,

बदल जाएँगी,

नव वर्ष के साथ।

 

हम बैठे रहें,

या चलते रहें,

संबंधों को सहेजे रहें,

या यादों के पहाड़ लिए रहें।

 

सब कुछ यथावत नहीं होगा,

यह तो तय बात है,

प्रेमिका का विवाह,

हो चुका होगा।

 

मित्र अमित्र हो चुकेंगे,

पैसा घटेगा या बढ़ेगा,

होगा बहुत कुछ नया,

जो पहले कभी न हुआ।

 

वर्ष चिड़िया नहीं हैं,

जो सदा चहचहाते रहेंगे,

न ही है अपना कोई शर्ट,

जो फटने पर भी साथ नहीं छोड़ता।

 

इस लिए आने वाले वर्ष में,

अनगिनत संभावनाओं और,

आशंकाओं के बीच में,

प्रतीक्षा करना होगी।

 

स्वागत करना होगा नए वर्ष का,

शायद मौसम बदल जाए,

कोई प्रेम कहीं खिल जाए,

जिंदगी अभी और चल जाए।

-अमिताभ शुक्ल

शनिवार, 3 फ़रवरी 2024

हँसते, गाते जीवन बीते

  

बीता अक्टूबर आया नवंबर,                                                                                         

दिसंबर, जनवरी भी बीत रहे,                                .

सर्दी,  गर्मी,  वर्षा और फिर सर्दी,  

पूरा हुआ एक वर्ष का काल ।।                                                               

                                                                                   गुजरा ऐसे ज्यों कई जन्म हों,                      

पल  -पल  बदले मौसम और विचारl l     

हवाई जहाज, रेलगाड़ी                    

                                                                                  रिश्ते - नाते सब बंद रहे,   

सारे संबंध ज्यो बंद हुए,                            

पर फिर से,                                        

शुरुआत हुई है,                                   

बिछड़े दोस्त मिले हैं।।  

हँसते, गाते,  जीवन बीते,                             

इस से ज्यादा नहीं माँगा है,                           

फिर से सबका साथ मिले,                       

प्यार और दुलार मिले,                                  

इस से ज्यादा कब चाहा है,                     

मनमौजी में वक्त गुजारा है ।।                       

जीवन मधुमास बने ,                                       

सारे संबंध फिर से अपने हो जाएँ,                                                                            

आस और उम्मीद है,                                      

कि जीवन मधुशाला हो जाए।।                     

फिर से सैर - सपाटे हों,                              

जीवन बस ऐसे ही,  

हँसते, मुस्कुराते गुजर जाए ii             

                          

-अमिताभ शुक्ल